Saturday, 26 July 2014

भीग गई हूँ आज भीतर तक

भीग गई हूँ आज भीतर तक,
बूँदों ने अहसास दिलाया,
भिगोया नहीं बारिश ने मुझे ,
भीगी हूँ प्रकृति के आंसू से।
ये रूदन इतना कर्णभेदी था ,
कि चीख रहा था बादल,
रो रही थी प्रकृति ,
थपेङे पवन के बनकर भाव ,
झकझोर रहे थे मुझे ,
भीगी नहीं आज बारिश में ,
भीगी हूँ प्रकृति के रोने सें ।

न जानू मैं न जाने तू

न जानू मैं न जाने तू,
छिपाया था जिसे अब तक ,
वो बाहर आया क्यूँ ,
हम तो पत्थरदिल थे ,
ये दिल आखिर पिघला क्यूँ ,
बंज़र हो चुकी इन आंखों से ,
कैसे बह निकला आंसू ......

मैं...

मैं तपती रेत का,
वो कण हूँ ,
जिस तक समुद्र की लहरें ,
कभी नहीं पहुँचती ,
ज्यों पास आती हैं लहरें ,
उठा कर हवा दूर कर देती हैं,
न जाने कब मेरी प्यास बुझेगी ,
इस तृष्णा को तृप्ति कब मिलेगी ?? बेहतर हैं दूर हूँ लहरों सें ,
मिल भी गई जो अब ,
मैं घुल न सकूँगी ,
जरूरी हैं दूर हो जाउ इनसे ,
ऐ हवा ! दे मेरा साथ ,
उङा ले जा मुझे ,
अपने वेग सें ।

वाह! ,

वाह! ,
ये तुमने खेल अच्छा रचा ,
तुम्हारी चाल ,
तुम्हारा प्यादा ,
जीत तुम्हारी ,
और रानी ,
वो भी तुम्हारी ,
वाह!
जरा बताना ,
इस खेल का नाम ,
मैं कहूँगी ,
ये हैं ,
छल ,
शह ,
और मात ,
जिसमें पिसती हैं रानी ,
तुम्हें इसमें रस मिलता हैं ,
और मुझे घृणा हैं ,
इस खेल से ,
क्योंकि मैं लगती हूँ ,
इस खेल में दांव पर ,
और ये खेल नहीं ,
छल हैं ,
मेरी अस्मित से खिलवाङ का ।
तुमने हर मोङ पर ,
हर कदम पर ,
मुझे मोहरा बनाया ,
शायद तुम्हें ज्ञात ही नहीं हैं,
मैं समझ चुकी हूँ ,
तुम्हारी हर चाल ,
और अब बारी ,
तुम्हारी हैं ,
और मैं ,
तुम्हारे इस घिनौने खेल का
अंत हूँ ।

तुम कहते हो....

तुम कहते हो ,
बदलाव हुआ हैं ,
हाँ सच कहा तुमने ,
बदलाव हुआ हैं ,
बदल गया हैं शोषण ,
घर की चारदीवारी नहीं,
ये अब होता हैं ,
खुले आसमान के नीचे ।
उस समय नग्न मैं नहीं ,
नग्न होती हैं इन्सानियत ,
कोई हाथ आगे नहीं आता,
जब छीनी जाती हैं ,
मेरी अस्मित,
वाकई बदलाव हुआ हैं ,
बदल गया हैं शोषण।
लटकती हूँ जब मैं,
दुष्कर्म के बाद ,
दिखती हैं तुम्हारी मानसिकता ,
बिकता हैं तुम्हारा ज़मीर ,
मरती उस समय मैं नहीं,
मरती हैं तब इन्सानियत ।
संभल जाओ इससे पहले ,
मैं कहूँ बदलाव हुआ हैं ,
बदल गया हैं समाज ,
जिसमें पुरूष हैं पर ......
स्त्री नहीं ।

Saturday, 5 July 2014

मेरी ज़िन्दगी


मेरी ज़िन्दगी,
अरे नहीं ! मेरी कहां...
जी हाँ , ये ज़िन्दगी मेरी नहीं,
ये हैं बस मेहरबानी,
जिसका सार हैं--
सिर्फ कुर्बानी।
जन्म लिया अंगना में,
खुशियाँ नहीं मातम मना,
स्वागत मेरा खिलौनों से नहीं,
तानों से हुआ।
कंधों पर बस्ते का नही ,
था रसोई का बोझ।
चीख-चीख कर कहा ,
पढने दो मुझे,
पर मेरी बात किसी ने न मानी,
ये ज़िन्दगी मेरी नहीं ,
ये है बस मेहरबानी,
जिसका सार हैं--
सिर्फ कुर्बानी।
हुई उमर जब शादी की,
बाबा समान आया कोई ,
न पूछी मेरी मर्जी ,
भर दी माँ ने हामी,
ज़िद थी दादी की,
अब तो मेरी ,
बलि हैं चढानी।
ये ज़िन्दगी मेरी नहीं,
ये हैं बस मेहरबानी,
जिसका सार हैं---
सिर्फ कुर्बानी।
ब्याह कर आयी ,
मैं नए घर,
हुआ खिलवाङ यहाँ,
मेरी अस्मिता का,
लूट लिया जो था मेरा,
थी एक सास यहाँ ,
थी एक ननद रानी,
पर पोते की चाह में,
कर दी गयी बेगानी ।
ये ज़िन्दगी मेरी नहीं,
ये हैं बस मेहरबानी ,
जिसका सार हैं --
सिर्फ कुर्बानी।
अब न हैं इतनी शक्ति,
न हैं इतनी सहनशीलता,
न बची इस समाज में,
जरा भी मानवता ,
नहीं जी सकती मैं,
बनकर स्वंय की स्वामिनी।
खत्म हो गई ज़िन्दगी ,
खत्म हो गई कहानी,
ये वो ज़िन्दगी थी ,
जिसका सार था---
सिर्फ कुर्बानी।
 
 

Thursday, 3 July 2014

फुटपाथ पर

इस चिलचिलाती धूप में,
बेच रहे हैं खिलोने ,
बीच सङक पर ,
छोटे-छोटे बच्चे ।

जब बिक जाते हैं खिलौने ,
तब बैठते हैं सङक किनारे ,
और जोङते है पैसे -
दो तीन चार और ये दस |

जाना हैं इन्हे अब ,
अपने शराबी मालिक के पास ,
देने अपने पैसे ,
मिल जाएगा इन्हे बदले में ,
सङा खाना गंदा पानी |

धूप में तपकर ,
पसीने में भीग कर ,
बिता रहे हैं जीवन ,
जो जीवन नहीं नरक हैं ।

खो गया हैं इनका बचपन कहीं ,
इस पर भी हम कहते हैं ,
चलो जी कोई बात नहीं ,
भूख के कारण करते हैं ये काम ,
कुछ और नहीं ये हैं बाल श्रम ,
जिसके लिए हम हैं ही बदनाम ।

रात में सो जाते हैं ,
वहीं फुटपाथ पर ,
नहीं सताता इन्हें मौत का डर ,
नहीं करता कोई इनका इंतज़ार ,
नहीं हैं इनका घर-परिवार ।

सुबह फिर उठना हैं इन्हें ,
बेचने हैं खिलौने ,
अपने लिए नहीं ,
अपने मालिक के लिए ,
उसकी शराब के लिए ।


मुझे पंख दे दो


अजन्मी अविकसित रह गई,
बेटे की चाह में ,
बलि चढ़ा दी गई ,
पर अब और नहीं ,
मुझे जन्म दे दो ,
माँ ! मुझे पंख दे दो ।
चूल्हा-चौंका झाङू-पोंछा ,
ये नहीं हैं किस्मत मेरी ,
नन्हीं-सी इन आंखो को ,
नए सपने दे दो ,
माँ ! मुझे पंख दे दो ।
दहेज छेङछाङ बलात्कार ,
अस्मिता मेरी रो रही ,
कर रहीं चीत्कार ,
इन कुरीतियों से मुक्ति दे दो ,
माँ ! मुझे जन्म दे दो ।
सरोजिनी कल्पना इंदिरा हो ,
या हो सायना सुभद्रा ,
देख तुम इनकी सफलता ,
मुझे किताब दे दो ,
माँ ! मुझे पंख दे दो ।
डोली मेरी अभी न उठाओ ,
एक साल मुझे और पढ़ाओ ,
झूठी इन बंदिशों को तोङ ,
मुझे आज़ादी दे दो ,
माँ ! मुझे पंख दे दो ।
 
 

जय हिंद


जिस मिट्टी में जन्म लिया ,
आज मुझे वो चूम रही ,
माथे पर तिलक लगा ,
आज मझसे कह रही -
' तेरा लहू ज़ाया नहीं जाएगा ,
तेरी कुर्बानी के कारण ही ,
देश में नया सवेरा आएगा ।'
मैं सैनिक इस देश का ,
प्रण था ये मेरा ,
जां लुटा रणभूमि में ,
माँ कर्जं उतारूँगा तेरा ।
मौत अगर आई मुझे ,
प्यार से अपना लूँगा ,
माँ मुझे कसम हैं तेरी ,
चंद सिक्को की खातिर ,
मैं देश न बिकने दूँगा ।
देख माँ आज लिपटा हूँ ,
मैं तेरे इस आंचल से ,
नज़र उतार तू मेरी ,
अपनी आंखो के काजल से ।
जन्म दिया था ,
जिस कोख ने मुझे ,
उससे यहीं कहूंगा ,
अगले जन्म में ओ माँ ,
मैं तेरा बेटा ही बनूँगा ।
एक विनती हैं मेरी तुझसे ,
फिर अगर मै आया ,
तेरी इस कोख में ,
माँ मुझे तू भेजियो ,
फिर से रणसंग्राम में ,
जां बहुत छोटी हैं ,
इस देश के सम्मान में ।
जय हिंद
 
 

तुम हो मेरी अपनी कविता

शब्दो का मेल नहीं ,
तुम छवि हो मेरी ,
आईना हो मेरे भावो का ,
रच जाती हो मन में ,
किसी स्वप्न की भांति ,
सखी हो या हो विचारो की सरिता ,
पहचान तुम्हारी यही हैं ,
तुम हो मेरी अपनी कविता ।

कसूर क्या था उसका ??


उसकी झुकी नज़र,
कुछ कहती थी ,
हर गम वो मासूम ,
अकेले ही सहती थी ,
कसूर क्या था उसका ??
न जाने कोई ,
कभी खुद को तो ,
कभी लङकी जात को कोसती थी ।
शायद ये वो कली थी,
जो खिली तो सही,
पर महक न सकीं ,
बेटी होने का बोझ,
वो हर पल ढ़ोती थी ।
किसोरी बनी तो ,
हवसीं निगाहें नोंचती थी ,
इस डर को ले ,
वो अंदर ही अंदर घुटती थी ।
ब्याही गई तो ,
दहेज की आग जलाती थी,
उसकी कोख न जन्में बेटी,
ये सोच उसे डराती थी ।
बेटा नहीं वो बेटी थी ,
कसूर यहीं था उसका ,
जो कभी खुद को तो ,
कभी लङकी जात को कोसती थी।
 
 

Wednesday, 2 July 2014

दीमक हैं ये नक्सलवाद

हम दबाते चले जाते हैं, 
वो सहते रहते हैं , 
हम छीनते रहते हैं , 
वो आंसू बहाते हैं । 
हम कर देते हैं , 
सारी हदें पार , 
वो देखते रहते हैं , 
बनकर लाचार । 
फूटता हैं जब इनका आक्रोश , 
पनपती हैं इनमें बगावत , 
तब हम कहते हैं , 
दीमक हैं ये नक्सलवाद ।

 

Naxalite

We go to press,
they are suffering,
we are being hijacked,
they tears.
We give,
crossed all limits,
see it live,
as helpless.
When heated resentment,
growth of these uprisings,
then we say,
The Naxalites are termites.

Tuesday, 1 July 2014

काली अंधियारी रात कहूँ....


काली अंधियारी रात कहूँ,
या कहूँ तुम्हें निशा,
जो भी हो तुम ,
हो मेरे भागते जीवन में ,
विश्राम की घङी ।
शांत बहती नदी हो तुम ,
हो शीतलता लिए चांद की,
नही जानती मैं ,
तुम स्वप्न हो मेरा ,
या हो कङी भावों के बांध की ।
इस गहरे मन में ,
बसती हो तुम सदा ,
खींच देती हो लकीरें ,
भावों पर अतीत की ।
काली अंधियारी रात कहूँ ,
या कहूँ तुम्हें निशा ,
सच कहूँ तो जीवन में मेरे ,
रेखा हो तुम स्मृतिपटल की ।