Friday, 12 October 2018

किरदार मां का ..

वो माँ बनती है ,
जिससे सह सके,
प्रसव की पीड़ा ,
तुम्हें जन्म देने के लिए ,
और कर सके ,
निर्माण तुम्हारे ज़रिये ,
एक नई पीढ़ी का ....

वो माँ बनती है ,
ताकि सुन सके ,
कुछ तानें ,
बेटी जनने के लिए ,
और लड़ सके ,
अपनी बेटी के हक़ के लिए ....

वो माँ बनती है ,
जिससे देख सके ,
बदलते हुए ,
अपने बेटे को ,
और बदल सके ,
खुद को अपनी औलाद के लिए ....

वो माँ बनती है ,
जिससे बदल सके ,
कुछ स्थितियां ,
उसके हिस्से के संघर्ष की ,
और दे सके ,
एक दिशा सार्थक बदलाव की ....

वो माँ बनती है ,
सिर्फ़ देने के लिए
और हम जन्म लेते है ,
जिससे ले सके उसका सर्वस्व ,
नकार सके उसकी पीड़ा ,
अनदेखा कर सके उसकी लड़ाई ..

हम जन्म लेते है ,
और बदल देते है
अपनी प्राथमिकता ,
और तोड़ देते है उसका स्वप्न,
मोड़ देते है खुद को ,
खोखली आधुनिकता की दिशा में ..

वो वही खड़ी देखती है ,
टूटते स्वप्नों को ,
अपनी पीड़ा छिपा लेती है ,
और दोष तुम्हे न देकर ,
कोसती है खुद को ....

पर अपने भीतर की माँ को ,
कभी मरने नही देती ,
क्योंकि वो माँ है ,
और ये किरदार ऐसा है ,
जो बस जीवन देता है ,
और सींचता रहता है जीवन को ,
कभी रक्त से ,
तो कभी आंसुओ से ....

©ज्योति

रात्रि अंधियारी

फूलों की पंखुड़ियों-सी कोमल ,
रौंद देते हो तुम अहं में ,
सिसकियां मिलाते हो मेरी ,
अपनी पैशाचिकता के गर्जन में ..

मेरे एक-एक रक्तमयी अश्रु पर ,
मर्दानगी का जयघोष सुनाते हो ,
लावारिस-सा गोश्त समझ ,
हवस की दावत उड़ाते हो ..

मैं आधार हूँ जीवन का
नारी जिसे सब कहते है
आंखों में भर वहशीपना
मै देवी हूँ- सब कहते है

मैं लाती तुम्हें दुनिया में
मानवता का पाठ पढ़ाती हूँ
इंसानियत को करते शर्मसार जब तुम
अपनी परवरिश पर ठगी रह जाती हूँ

मैं सृष्टि सर्जन का माध्यम बनी
पर जीवन के हक़ से वंचित हूँ
जिस आँचल में दूध भरा था
लिपटी उसी में रक्तरंजित हूँ

कभी खिलखिलाती चंचला थी
बनी आज इक दुखियारी हूँ
जिसके हक़ में आनी थी सुबह
वो स्वयं बनी रात्रि अंधियारी हूँ...

©ज्योति