Wednesday, 31 August 2016

बदलो अपनी छवि

तुम सुन्दर नही हो ,
तो दहेज़ ज्यादा दो ,
गर बहुत सुंदर हो ,
तो अग्निपरीक्षा ...

एक सवाल है ,
जवाब दोगी -
क्या तुम बनी हो ,
सिर्फ़ देने के लिए ?

गर नही ,
तो क्यूँ सर्वस्व समर्पित हो ,
पुरुषों की ,
हर जायज नाजायज़ मांग पर ?

गर हां ,
तो क्यूँ मांगती हो ,
अपना हक़ समाज से ,
सड़ो न चारदीवारी में ...

चलो छोड़ो ,
तुमसे कुछ कहना है बेकार ,
तुम बस माध्यम बनी हो अब तक ,
सृष्टि को आगे बढ़ाने का ...

गर सहमत नही हो मुझसे ,
तो बदलो अपनी छवि ,
सीता से गीता बनो ,
किसी मूर्ख की परिणीता नही ....

Sunday, 28 August 2016

पहाड़ नही नदी

मै पहाड़ नही ,
नदी होना चाहती हूँ ,
जड़ता नही ,
बहना चाहती हूँ ....

बहना चाहती हूँ ,
के सागर में मिलने को नही ,
दुनिया को देखना चाहती हूँ
मै पहाड़ नही ,
नदी होना चाहती हूँ ....

जीवन में ऊंचाई नही ,
गहराई चाहती हूँ,
मै निर्जन नही ,
जीवन बनना चाहती हूँ ...

बीहड़ जंगलो की ज़मीं नही ,
उस बीहड़ता से ,
गुजरना चाहती हूँ ,
मै पहाड़ नही ,
नदी होना चाहती हूँ ....

जानती हूँ नियति मेरी ,
मैला हो सूख जाना है ,
पर मै मन की मैल ,
बहाना जानती हूँ ...

मै पहाड़ नही ,
नदी होना चाहती हूँ,
मै जड़ता नही ,
बहना चाहती हूँ....

Sunday, 7 August 2016

कमजोर

कभी कभी कमजोर होना ,
अच्छा होता है ,
किसी की कोई फ़िक्र नही ,
सारी परेशानी ,
सारे जज़्बात ,
जब चाहो बहा दो ,
ज़ार ज़ार ,
आँखों का पानी ,
बहता रहे ,
कोई परवाह नही ,
और तो और ,
मन भारी भी नही होता ,
कभी कभी चाहती हूँ ,
मै भी ,
कमजोर ,
होना ,
के ,
अब मन ,
भारी ,
बहुत भारी हो गया है ,
थोड़ी परेशानी बहा ,
फिर मजबूत ,
बनना चाहती हूँ ....

Thursday, 4 August 2016

लड़की जात

"तुम लड़की हो ,
इतना मत हँसो ,
यूँ हर किसी पर ,
यक़ीन न करो ,
ज्यादा बात न करो ,
मत भूलो ,
ये समाज ,
इंसानों का नही ,
सामंतो का है ,
ये सामंत हथिया लेंगे,
तुम्हारी इज्जत ,
जैसे तुम लड़की नही ,
बस इक ज़मीं का टुकड़ा हो ,
तुम हँसोगी ,
ये समझेंगे ,
तुम फस गयी ,
तुम यक़ीन करोगी इन पर ,
ये तुम्हें जोत देंगे ,
ऊगा देंगे जख्मों की फसल ,
तुम बतियाओगी इनसे ,
ये समझेंगे ,
अब तुम बस उनकी हो ,
और हाँ ,
जहा इन्होंने ये सोचा ,
समझो ,
तुम अब फंस चुकी हो ,
इसलिए कहती हूँ ,
तुम लड़की हो ,
तम्हे कोई हक़ नही ,
के तुम हँसो ,
बोलो ,
और हां यक़ीन ,
ये शब्द तुम्हारे लिए नही है ....
तुम लड़की हो ,
तुम बनी हो ,
चार हाथ का घूंघट काढ़ कर ,
चूल्हा चौका करने को,
अपनी औकात मत भूलो,,
वरना तुम भी बन जाओगी ,
दामिनी ...
निर्भया ....
या ,
एक अनाम ,
बलात्कार पीड़िता ..."

नोट :- पुरुषों की हंसी तो फंसी मानसिकता पर आधारित ..कृपया व्यक्तिगत न ले ...

4-अगस्त-2016
©ज्योति