तुम सुन्दर नही हो ,
तो दहेज़ ज्यादा दो ,
गर बहुत सुंदर हो ,
तो अग्निपरीक्षा ...
एक सवाल है ,
जवाब दोगी -
क्या तुम बनी हो ,
सिर्फ़ देने के लिए ?
गर नही ,
तो क्यूँ सर्वस्व समर्पित हो ,
पुरुषों की ,
हर जायज नाजायज़ मांग पर ?
गर हां ,
तो क्यूँ मांगती हो ,
अपना हक़ समाज से ,
सड़ो न चारदीवारी में ...
चलो छोड़ो ,
तुमसे कुछ कहना है बेकार ,
तुम बस माध्यम बनी हो अब तक ,
सृष्टि को आगे बढ़ाने का ...
गर सहमत नही हो मुझसे ,
तो बदलो अपनी छवि ,
सीता से गीता बनो ,
किसी मूर्ख की परिणीता नही ....