मनहूस हूँ तो मनहूसियत की बात होगी ,
आज मेरे आंगन में आंसू की बरसात होगी ,
होती होगी कही सुनहरी सुबह तो होती रहे
मेरी दुनिया में तो बस गम की रात होगी
...
Saturday, 7 January 2017
मनहूसियत
Thursday, 5 January 2017
तुम
कभी झूम झूम बरसते हो तुम ,
कभी रेगिस्तान सा छोड़ देते हो ,
कभी सींचते हो धान सा तुम ,
कभी कैक्टस सा चुभने देते हो ,
जब जी आता है खेलते हो तुम ,
कभी रुमाल समझ रख देते हो ....
कमाल लगती हूँ ,
धमाल लगती हूँ ,
बेमिसाल लगती हूँ ,
कहने को तो इंसान हूँ ,
पर इन लोफरो को माल लगती हूँ ....
सीता बनती हूँ ,
सावित्री बनती हूँ ,
अहिल्या बनती हूँ ,
कभी द्रौपदी बन जाती हूँ ,
पर कबीरा को तो मायाजाल लगती हूँ ....
बेटी भी हूँ ,
बहन भी हूँ ,
पत्नी भी हूँ ,
जीवनदायनी माँ भी मै हूँ ,
फिर भी समाज को जी का जंजाल लगती हूँ ...
आक्षेप नही लगाती मै ,
पूछती हूँ बस इक सवाल ,
क्यूँ मै नज़र नही आती तुम्हे ,
क्या बस एक खिलवाड़ लगती हूँ ...
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