जानते हो ,
आज की बारिश ,
अकेले नही आयी,
ले कर आयी थी ,
तुम्हारी यादों का पिटारा ,
भिगों कर मुझे ,
तरबतर कर गयी ,
तुम्हारी यादों से ,
अपनों की ही भीड़ में ,
मुझे अकेला कर ,
कह गयी ,
मुझे कोई हक़ नहीं ,
तुम्हारे बिना ,
यूँ भीगने का ,
भीग कर ,
बालों को खोलने का ।
शायद ,
मै भी यही सोचती हूँ ,
ये बारिश ,
ये भीगना ,
बालों का खुलना ,
सिर्फ तुम्हारे लिए था ,
और आज ,
बेहतर होगा ,
मै इन बालों को ,
सपनो को समेट लूँ ,
इंतज़ार करुँ ,
तुम्हारे आने का ,
उस बारिश का ,
जिसमे कभी ,
भीगे थे हम-तुम ।
Friday, 29 April 2016
बारिश
Thursday, 28 April 2016
फन्दे स्वेटर के
सर्दी के दिनों में ,
बुनती थी माँ स्वेटर ,
सिलाईयों में डालती थी फन्दें ,
कभी उलटे कभी सीधे ,
कभी सादे तो कभी जालीदार ,
रंग-बिरंगे ऊनों से ,
बुनती थी माँ स्वेटर ।
एक रोज खिली धूप में ,
माँ बुन रही थी स्वेटर ,
लाल - नीले ऊनों से ,
स्वेटर था वो धारीदार ,
बुनते हुए स्वेटर ,
माँ ने देखा उलझ गए हैं फन्दे ,
माँ सुलझाती रही ,
ऊन उलझते रहे ,
सारी कोशिशें माँ की नाकाम हुई ,
शायद ये फन्दें ऊन के नहीं ,
ये रिश्तें थे माँ के जीवन के ,
जो कभी सुलझें नहीं |
आज भी माँ की वो कोशिश ,
याद आती हैं ,
याद आते हैं वो स्वेटर ,
पर अब न माँ हैं मेरे पास ,
न ही वो स्वेटर ,
बचा हैं कुछ ,
तो वो हैं ,
वहीं उलझे रिश्ते .....
माँ तेरी कोशिश
माँ,
तू नही बदली ,
हाँ,
तनिक नही बदली ,
वो ,
बाते छिपाने की आदत ,
यूँ ,
सब सहने की लत,
अब भी ,
न बदली ,
माँ ,
तू नही बदली ,
हाँ ,
तनिक नही बदली ....
तेरी ,
हर वो कोशिश ,
घर बचाने की ,
तेरे ,
रोज के पैंतरे ,
रिश्ते सजाने के ,
वैसे ही है ..
माँ ,
न तू बदली ,
न तेरी हसरते ,
बस ,
बदले तो ये रिश्ते ,
बदली तो ये दुनिया ,
पर तू ,
तू ,
बिल्कुल न बदली ...
कहो! आओगे न
जब डूबेगा सूरज ,
होगी सुरमयी रात ,
तो ख्वाबों में नही ,
करने असल में मुलाक़ात ,
कहो!
आओगे न ...
जब दबी रह जायेगी ,
दिल में दिल की बात ,
तो लेकर हाथों में हाथ ,
सुनने मुझे ,
कहो !
आओगे न ...
प्रियतम यूँ बैठ अटरिया पर ,
देख आसमां में चाँद ,
जब याद करूंगी तुम्हे ,
तो लगा स्नेह के पंख ,
कहो !
आओगे न ...
Wednesday, 27 April 2016
कहानी (भाग-3)
सुनो,
अब आगे कहने को,
समर्थ नही हूँ,
के ,
एक बार फिर ,
नही ,
झेल सकती मै ,
वो सब,
जो मै झेल चुकी हूँ,
नही ,
याद कर सकती,
के ,
तुमने जब कहा -
"निशानी हमारे प्रेम की ,
प्रेम नही गलती है"
एक बात पूछूँ -
" ये गलती ,
अभी कब तक करोगे ,
रुकोगे कभी ,
या यूँही खेलोगे ,
खेल प्यार का,
और बोलोगे -गलती है ।"
हाँ ,
हाँ ,
हाँ,
ये गलती है ,
तुम्हारी नही मेरी ,
जो मै ,
हंसती रही ,
तुम्हारे हर खेल में ,
पर अब ,
अब और नही ,
के,
मै नही सह सकती,
तुम्हारे उठाये प्रश्नचिन्ह,
मेरे व्यक्तित्व पर ,
बस ,
आज के लिए ,
इतना ही ,
और जानना चाहो,
तो फिर आना ,
कभी ेदहलीज पर ,
कलेजा मजबूत कर अपना,
हां ,
कलेजा मजबूत कर,
के ,
तुम इतने सक्षम नही ,
जो सुन लो ,
वो सब ,
जो मै झेल चुकी हूँ ।
कहानी (भाग -2)
कहानी (भाग-2)
सुनो,
निकल तो गए हो तुम,
मेरी इस ज़िन्दगी से,
क्या सुनोगे नही ,
जाते जाते अपनी गाथा ,
याद है ,
जब मिले थे तुम,
पहली बार ,
और कहा-
'मुझे चाल पसन्द है तुम्हारी '
और मै ,
मै बस हँस दी ,
फिर ,
हम मिले ,
अब दरम्यां हमारे ,
कोई न था ,
तुम रोज़ खेलते थे,
खेल प्यार का ,
और मै ,
बस हँस देती
तबसे ,
मै हंसती रही ,
शायद ,
समझ ही न सकी ,
के तुम ,
जो कभी दीवाने थे ,
मेरी चाल के ,
अब बदल रहे हो ,
अपनी चाल ,
मै नही समझ सकी ,
के तुम ,
अब हो रहे हो दीवाने ,
किसी और ,
चाल-ढाल के ,
मै ,
बस हंसती रही ,
देखती रही ,
तुम्हे गिरते हुए ,
अपनी निगाहों से ,
और देखो ,
आज तुम ,
खुद गिर गए हो ,
अपनी ही निगाहो में .....
Sunday, 24 April 2016
प्रेम
हाँ ,
प्रेम है मुझे ,
प्रेम इन पन्नों से ,
प्रेम इस स्याही से ,
जो अक्सर बयां कर देते है ,
मेरे अनकहे जज़्बात ।
हाँ,
प्रेम है मुझे ,
प्रेम इन सपनो से ,
प्रेम इन रातो से ,
जिनमे कहती हूँ मै ,
तुमसे दिल की बात ।
हाँ ,
प्रेम है मुझे ,
प्रेम है तुमसे ,
प्रेम है मुझसे ,
बोलो ,
और कितना प्रेम चाहिए ....
कहानी (भाग-1)
क्यूँ लौट आये तुम ,
मेरी इस ज़िन्दगी में ,
हा , इस ज़िन्दगी में ,
जहां घुटन होती थी तुम्हे ,
और तुम ,
निकलना चाहते थे ,
एक नया खेल खेलने ,
खेल दूसरी ज़िन्दगी का ,
जानती हूँ ,
मात मिली है तुम्हे ,
और तुम ,
तुम हताश हो ,
पर सुनो ,
मत सोचना अब ,
के तुम आओगे ,
रहोगे ,
खेलोगे ,
एक बार फिर इस ज़िन्दगी से ,
क्या कहा-
बदल गए हो तुम ,
हाँ , सच ही तो है,
बदल गए हो ,
पहले तुम खेलते थे मुझसे ,
और अब खेलते हो ,
मेरी यादो से ,
कुरेदते हो ,
नोंचते हो ,
अपने ही दिये ज़ख्मों को ,
पर अब और नही ,
जाओ ,
निकल जाओ ,
इस ज़िन्दगी से ,
के इसमें तुम्हारे खेलो की,
अब कोई जगह नही ।
Friday, 22 April 2016
नींद
देखो ,
कुछ चुभ रहा है आँखों में ,
छींटे भी मार लिए ,
तुम्हारे साथ के ,
कोई असर नही,
लगता है ,
इस बार तुम नही ,
नींद अटक गयी है ,
इन आँखों में ....
तुम कहाँ थे ?
भरे बाज़ार,
जब खोयी मैंने ,
अस्मित ,
तुम कहाँ थे ?
दर्द भरी चीख में ,
जब मैने लगाई ,
गुहार ,
तुम कहाँ थे ?
तन पर मेरे ,
जब बचा न कोई ,
चिथड़ा ,
तुम कहाँ थे ?
बोलो ,
है जवाब,
नही न ,
मै बताती हूँ ,
मोमबत्ती जला ,
बैठे थे तुम ,
किसी और ,
नग्न हुई आत्मा के लिए ।
काश!
तुम आजाते ,
तो बच जाती मै ,
पर तुम ,
तुम तो व्यस्त थे ,
नारीविमर्श का झंडा ,
गाड़ने में ...