Thursday, 28 April 2016

फन्दे स्वेटर के

सर्दी के दिनों में ,
बुनती थी माँ स्वेटर ,
सिलाईयों में डालती थी फन्दें ,
कभी उलटे कभी सीधे ,
कभी सादे तो कभी जालीदार ,
रंग-बिरंगे ऊनों से ,
बुनती थी माँ स्वेटर ।
एक रोज खिली धूप में ,
माँ बुन रही थी स्वेटर ,
लाल - नीले ऊनों से ,
स्वेटर था वो धारीदार ,
बुनते हुए स्वेटर ,
माँ ने देखा उलझ गए हैं फन्दे ,
माँ सुलझाती रही ,
ऊन उलझते रहे ,
सारी कोशिशें माँ की नाकाम हुई ,
शायद ये फन्दें ऊन के नहीं ,
ये रिश्तें थे माँ के जीवन के ,
जो कभी सुलझें नहीं |
आज भी माँ की वो कोशिश ,
याद आती हैं ,
याद आते हैं वो स्वेटर ,
पर अब न माँ हैं मेरे पास ,
न ही वो स्वेटर ,
बचा हैं कुछ ,
तो वो हैं ,
वहीं उलझे रिश्ते .....

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