तुम चंद तमगों पर खरीदते हो ,
ज़िंदगी एक सैनिक की ,
वो मिट्टी के लिए मिट्टी हो जाते ,
तुम नही समझते क़ुरबानी सैनिक की ....
लाख दो लाख नही ,
तुम अरबो से घर भर दो उनके ,
पर क्या लौटा सकोगे सिंदूर उसका ,
जो बन बैठी विधवा सैनिक की ....
तुम शोक जता मुक्त हो जाते ,
अपनी जिम्मेदारी से ,
वो बैठे आस में पिता के लौटने की ,
जो औलाद है उस सैनिक की ....
अब ये न कहना तुम बात करोगे ,
के अब न सह पायेगी धरती देश की ,
माँ की गोद में शहादत ,
अर्थी पिता के कंधों पर सैनिक की ...
वो मिट्टी के लिए मिट्टी हो जाते ,
तुम नही समझते क़ुरबानी सैनिक की ....