Monday, 22 May 2017

बेलगाम जानवर

जानती हूं ,
बहुत पीड़ा हुई होगी तुम्हे ,
उसके नाखूनों की चोट से ,
रक्त भी बहा होगा न ,
उन घाव से ....

समझती हूं ,
कितना मुश्किल रहा होगा ,
उसकी आत्मा को रौंदना ,
लगाना पड़ा होगा न ,
एड़ी चोटी का जोर ...

क्या कहूँ ,
थी ही ऐसी वो ,
हिम्मत की मिसाल ,
हार मानने को ,
तैयार ही नही थी ...

हा साथ हूँ ,
बोल तो रही तुम्हारी ओर से,
झुकाना जरूरी था उसे ,
भला वो औरत ,
थूकती रही तुम्हारी मर्दानगी पर ...

हारे नही तुम ,
जीतते रहे ,
उसकी बयालिस साल की पीड़ा में ,
और अंत मे तुम्हें दिखा के ठेंगा ,
वो मुक्त हो गयी ....

सच गलत थी वो ,
हां गलत थी ,
जो समझती थी तुम्हे मर्द ,
हाँ तुम मर्द नही थे ,
इक जीव थे ,
जिसकी मर्दानगी ,
इक बेलगाम घोड़ा थी ,
जो हार के डर से ,
अरुणा को कुचल गयी ....

मै समझती हूं तुम्हे ,
तुम्हारी पीड़ा को ,
और साथ देते हुए तुम्हारा ,
कहती हूँ सरेआम ,
सजा तुम्हे नही ,
उस बेलगामीयत के हथियार को मिले ,
जो तुम्हे एहसास कराती ,
तुम्हारे जानवर होने का ...

©ज्योति

Sunday, 21 May 2017

त्रासदी

आधी रात ,
शहर सोया था ,
जाने क्या हुआ ,
जीव लाश बन गए ,
जो बचे ,
वो विकलांग थे ,
हा ,
विकलांग थे ,
गवाह थे ,
ज़िन्दगी और मौत के बीच ,
बची उस विद्रूपता का ,
जिनका साथ ,
न तो अमेरिका ने दिया ,
न साथ मिला उन्हें ,
सरकार का ,
वे तो बस ,
गवाह थे ,
भयंकर त्रासदी के ....

साथ भले न दिया किसी ने ,
सांत्वना बहुत मिली उन्हें ,
आज भी मिल जाती ,
जब आती है तारीख -
तीन दिसम्बर ,
और फिर ,
फिर क्या ,
ये करने लगते है इंतज़ार ,
इंतज़ार ,
सहानुभूति का नही ,
इंसाफ का ,
जो इस देश मे ,
मिलता ही नही ....

सोचो ,
बस एक रसायन ,
सायनाइड ,
एक कम्पनी,
यूनियन कार्बाइड ,
थोड़ी-सी बेपरवाही ,
और परिणाम ,
एक भयंकर त्रासदी ,
भोपाल गैस त्रासदी ...

©ज्योति