जानती हूं ,
बहुत पीड़ा हुई होगी तुम्हे ,
उसके नाखूनों की चोट से ,
रक्त भी बहा होगा न ,
उन घाव से ....
समझती हूं ,
कितना मुश्किल रहा होगा ,
उसकी आत्मा को रौंदना ,
लगाना पड़ा होगा न ,
एड़ी चोटी का जोर ...
क्या कहूँ ,
थी ही ऐसी वो ,
हिम्मत की मिसाल ,
हार मानने को ,
तैयार ही नही थी ...
हा साथ हूँ ,
बोल तो रही तुम्हारी ओर से,
झुकाना जरूरी था उसे ,
भला वो औरत ,
थूकती रही तुम्हारी मर्दानगी पर ...
हारे नही तुम ,
जीतते रहे ,
उसकी बयालिस साल की पीड़ा में ,
और अंत मे तुम्हें दिखा के ठेंगा ,
वो मुक्त हो गयी ....
सच गलत थी वो ,
हां गलत थी ,
जो समझती थी तुम्हे मर्द ,
हाँ तुम मर्द नही थे ,
इक जीव थे ,
जिसकी मर्दानगी ,
इक बेलगाम घोड़ा थी ,
जो हार के डर से ,
अरुणा को कुचल गयी ....
मै समझती हूं तुम्हे ,
तुम्हारी पीड़ा को ,
और साथ देते हुए तुम्हारा ,
कहती हूँ सरेआम ,
सजा तुम्हे नही ,
उस बेलगामीयत के हथियार को मिले ,
जो तुम्हे एहसास कराती ,
तुम्हारे जानवर होने का ...
©ज्योति