आधी रात ,
शहर सोया था ,
जाने क्या हुआ ,
जीव लाश बन गए ,
जो बचे ,
वो विकलांग थे ,
हा ,
विकलांग थे ,
गवाह थे ,
ज़िन्दगी और मौत के बीच ,
बची उस विद्रूपता का ,
जिनका साथ ,
न तो अमेरिका ने दिया ,
न साथ मिला उन्हें ,
सरकार का ,
वे तो बस ,
गवाह थे ,
भयंकर त्रासदी के ....
साथ भले न दिया किसी ने ,
सांत्वना बहुत मिली उन्हें ,
आज भी मिल जाती ,
जब आती है तारीख -
तीन दिसम्बर ,
और फिर ,
फिर क्या ,
ये करने लगते है इंतज़ार ,
इंतज़ार ,
सहानुभूति का नही ,
इंसाफ का ,
जो इस देश मे ,
मिलता ही नही ....
सोचो ,
बस एक रसायन ,
सायनाइड ,
एक कम्पनी,
यूनियन कार्बाइड ,
थोड़ी-सी बेपरवाही ,
और परिणाम ,
एक भयंकर त्रासदी ,
भोपाल गैस त्रासदी ...
©ज्योति
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