सुनो अभी आये हो ,
थोड़ा ठहर कर जाना ,
बहुत सी बातें करनी है ,
हा तुमसे बातें करनी है ,
जानते हो कितना कतराती थी ,
मै तुमसे बात करने में ,
अक्सर दूर से देख ,
पलट जाती थी कही और ,
डरती थी कही देख न लो ,
और पूछ न लो ,
अपने सवालों का जवाब ,
पर अब डरती नही मै ,
इंतज़ार करती हूँ तुम्हारा ,
तुम आओ और हम बात करे ,
जानते हो क्यूँ ,
क्यूंकि अब तुम्हारे सवाल ,
खाने के टेबल में बदल चुके है ,
और मेरे जवाब ,
बन चुके है तुम्हारे ,
ऑफिस से आने के इंतज़ार में ...
Friday, 17 June 2016
तुम्हारे सवाल और मेरे जवाब
Saturday, 11 June 2016
बेड़ियां
कौन कहता है ,
नारी जानवर समान है ,
जकड़ती है बेड़िया ,
लोहे की जानवरों को ,
अजी नारी के लिए ,
तो सोने की बेड़ियां है ..
Friday, 10 June 2016
तुम्हारा महाकाव्य - 'बलात्कार'
क्या सोचते हो तुम ?
मुझे यूँ जबरन पा लेने से ,
तुम बलात्कारी हो जाते हो,
और तुम्हारा ये कुकर्म ,
बलत्कार बन जाता है ...
नहीं
बलत्कार सिर्फ इतना ही नही ,
इससे कहीं बढ़कर है ,
तुम तो इस प्रक्रिया का ,
पहला चरण मात्र हो ....
जब तुम रौंदते हो,
मेरी आत्मा को ,
नोंचते खसोटते हो,
मेरे ज़िस्म को ,
तब मेरा शरीर घायल होता है ,
और पूरा होता है ,
इस प्रक्रिया का पहला चरण ।
फिर जब फेंक देते हो ,
मुझे जूठी हड्डी की तरह,
सड़क किनारे ,
तब कुछ जानवरो की निगाहें ,
चाटती है मुझे,
मेरा अंग-अंग निहार ,
अपनी भूख मिटाती है ,
और तब पूरा होता है ,
इस प्रक्रिया का दूसरा चरण ।
तभी कुछ रौशनी जलती बुझती है ,
और अगले ही दिन ,
मेरे इस नंगे ज़िस्म का प्रचार,
घर घर होता है ,
और शाम तक मेरी नाम की मोमबत्ती,
कर देती है रौशन शहर को ,
और ये था ,
इस प्रक्रिया का तीसरा चरण ।
अब तक मै ,
जूठी नंगी हड्डी मात्र थी,
जिसे एक हादसे ने ,
घर घर में ,
मुद्दा बना दिया बहस का ।
अब शुरू होता है ,
तुम्हारी इस हरकत का ,
अंतिम चरण,
जहां मै खड़ी हूँ
न्याय के लिए ,
पर यहां भी न्याय नही मिलता ,
मिलती तो तुम्हे है -
मुक्ति ,
और इस मुक्ति की कीमत ,
मै चुकाती हूँ -------
तुम्हारे हाथों की छाप ,
मेरे ज़िस्म के किस किस कोने पर है ,
तुम्हारे दांतों के निशां कितने है ,
कितनी मरतबा तुमने ,
इस महाकाव्य को ,
रचा है मेरे शरीर पर ,
सब बताती हूँ ।
और यहां तक पहुंचते पहुंचते ,
मेरा ज़िस्म ,
मेरी आत्मा ,
सब जूठा हो चुका है ,
और मै खड़ी ,
इस न्यायसभा में ,
तुम्हारे रचे इस महाकाव्य को ,
नाम दे रही हूँ -
बलात्कार का ।
ख़्वाब पूरे नही होते
काश !
मै निभा सकती ,
वो सारे वादें ,
जो मै अक्सर करती हूँ ,
तुमसे ख्वाबो में ....
काश !
मै बैठती ,
तुम्हारे संग सागर किनारे ,
देखती उठ कर गिरती लहरें ,
और कहती ,
ये लहरें उतार चढाव है ,
हमारे जीवन के ,
जिन्हें हम साथ में देखेंगे...
काश !
मै चलती ,
तुम्हारे संग ,
कदम से कदम मिला ,
और बिता देते हम,
यूँ ही सारी ज़िंदगी ...
काश !
मै सुन पाती ,
वो मधुर गीत ,
जो तुम गाते ,
मेरे लिए सिर्फ़ मेरे लिए ,
और मै बस मुस्कुराती रहती...
काश !
ये सच हो पाता,
तो सोचो ,
हम कितने खुशनसीब होते ....
पर सुनो,
ये जो ख्वाब है न ,
ये पूरे नही होते ,
इसलिए बेहतर होगा ,
तुम और मै ,
हम न बने ,
बस जीते रहे ,
अपना अलग अलग व्यक्तित्व,
और इन ख्वाबो को ,
दफ़्न कर दे ,
दिल के किसी कोने में ....
Tuesday, 7 June 2016
ठंडक
सुनो ,
तुम पूछते थे न ,
क्या रिश्ता है ,
मेरा तुम्हारा ,
लो आज बता देती हूँ ...
तुम ठंडे पानी की ,
भरी हुई बोतल हो ,
और मै ,
बोतल से फिसलती हुई,
इक बूँद ...
जो फिसलती है ,
और फिर ,
बन जाती है ,
फिर फिसलती है ,
और फिर ,
बन जाती है ...
तुम्हारी ठंडक से ,
जन्म लेती हूँ मै ,
और बन जाती हूँ ,
तुम्हारी इस ,
ठंडक की पहचान ...
कुछ ऐसा ही रिश्ता है ,
मेरा और तुम्हारा ,
जो बार बार ,
जन्म लेता है ,
और कायम रखता है ,
अपना अस्तित्व ...
Saturday, 4 June 2016
मै लिखती हूँ
हां ,
मै लिखती हूँ ,
प्रेम पर ,
लिखती हूँ ,
बोलो गुनाह है ,
क्या न लिखूं ,
छोड़ दूँ ,
लिखना ,
पर सुनो ,
गर मै न लिखूं ,
तो क्या मानोगे तुम ,
मै प्रेम में नही थी ,
बस लिखती थी ,
प्रेम को विषय बना ,
और तुम ,
तुम तो बने ही हो ,
मुझे रोकने के लिए ,
जब देखो ,
खड़े हो जाते हो ,
लगाते हो प्रश्नचिन्ह,
मेरे चरित्र पर ,
जानते हो ,
तुम मुझे नही ,
खुद को खड़ा करते हो ,
कटघरे में ,
जहां तुम्हारी सोच,
तुमसे भी छोटी दिखती है ...
सन्नाटो को सुनो
ये घनी काली रात ,
घुप्प अँधेरा ,
सन्नाटों का शोर ,
अब डराता नही ...
अच्छी लगती है रात ,
भाने लगा है मुझे
अँधेरा ,
और ये सन्नाटा ...
खंगलने लगती हूँ खुद को,
करती हूँ बाते दीवारो से ,
सुनती हूँ सन्नाटों को ,
और खो जाती हूँ ,
अतीत में ...
ये अँधेरा ,
सन्नाटा सब कहते है ,
मै रात हूँ ,
और तुम तारा ,
जो दूर भले हो ,
पर हो ,
नज़रो के सामने ....