सुनो ,
तुम पूछते थे न ,
क्या रिश्ता है ,
मेरा तुम्हारा ,
लो आज बता देती हूँ ...
तुम ठंडे पानी की ,
भरी हुई बोतल हो ,
और मै ,
बोतल से फिसलती हुई,
इक बूँद ...
जो फिसलती है ,
और फिर ,
बन जाती है ,
फिर फिसलती है ,
और फिर ,
बन जाती है ...
तुम्हारी ठंडक से ,
जन्म लेती हूँ मै ,
और बन जाती हूँ ,
तुम्हारी इस ,
ठंडक की पहचान ...
कुछ ऐसा ही रिश्ता है ,
मेरा और तुम्हारा ,
जो बार बार ,
जन्म लेता है ,
और कायम रखता है ,
अपना अस्तित्व ...
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