हां ,
मै लिखती हूँ ,
प्रेम पर ,
लिखती हूँ ,
बोलो गुनाह है ,
क्या न लिखूं ,
छोड़ दूँ ,
लिखना ,
पर सुनो ,
गर मै न लिखूं ,
तो क्या मानोगे तुम ,
मै प्रेम में नही थी ,
बस लिखती थी ,
प्रेम को विषय बना ,
और तुम ,
तुम तो बने ही हो ,
मुझे रोकने के लिए ,
जब देखो ,
खड़े हो जाते हो ,
लगाते हो प्रश्नचिन्ह,
मेरे चरित्र पर ,
जानते हो ,
तुम मुझे नही ,
खुद को खड़ा करते हो ,
कटघरे में ,
जहां तुम्हारी सोच,
तुमसे भी छोटी दिखती है ...
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