ये घनी काली रात ,
घुप्प अँधेरा ,
सन्नाटों का शोर ,
अब डराता नही ...
अच्छी लगती है रात ,
भाने लगा है मुझे
अँधेरा ,
और ये सन्नाटा ...
खंगलने लगती हूँ खुद को,
करती हूँ बाते दीवारो से ,
सुनती हूँ सन्नाटों को ,
और खो जाती हूँ ,
अतीत में ...
ये अँधेरा ,
सन्नाटा सब कहते है ,
मै रात हूँ ,
और तुम तारा ,
जो दूर भले हो ,
पर हो ,
नज़रो के सामने ....
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