Thursday, 26 May 2016

मेरी कहानी (भाग-5)

सुनो ,
मै थक गयी हूँ ,
रोपते-रोपते ,
रिश्तों की बंजर जमीं ,
और जान गयी हूँ ,
अब इस ज़मीं पर ,
नही उगने वाली ,
फसल प्रेम की ,
न ही उगेंगे फूल ,
विश्वास के ,
फिर भी ,
सींचती हूँ इसे ,
अपने खून से ,
आंसुओ से ,
ये सोच ,
बंजर है तो क्या हुआ ,
ये ज़मीं ,
ये रिश्ते ,
हाथ से निकल न जाये ...

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