Friday, 13 April 2018

ज़रिया

तुम बस ज़रिया हो ,
राजनीति का ,
जिसे अभी विपक्ष खेल रहा है ,
और अगले सत्र में ,
आज का पक्ष खेलेगा ,
और मांग करेगा ,
तुम्हारी सुरक्षा की ....

तुम बस ज़रिया हो ,
धर्म के ह्रास का ,
जिसे आज मन्दिर ने झेला है ,
और कल ,
टूटेगी मस्जिद कोई ,
जब वहां कोई लूटेगा ,
तुम्हारी अस्मित ..

तुम समझती क्यूँ नही ,
तुम बस एक ज़रिया हो ,
सबके घरों में लगे ,
छप्पन इंच की टी.वी पर आने का ,
जब घूमेंगे हम इंडिया गेट ,
हाथों में मोमबत्ती लिए ...

मानो मेरी बात ,
तुम बस ज़रिया हो ,
मात्र एक ज़रिया ,,
अपनी हवस बुझाने का ,
कभी घर मे ,
कभी बस में ,
कभी मन्दिर में ,
तो कभी सड़क पर ...

अगर नही यक़ीन मेरी बातों पर ,
तो ये ज़रिया बनना बंद करो ,
बन्द करो इंसाफ़ की गुहार लगाना ,
छीन लो तुम इसे ये हक़ है तुम्हारा ,
गर न छीन सकी अब ,
तो न कहना कभी ,
ज़माना बड़ा खराब है ...

©ज्योति

Thursday, 5 April 2018

पहचान

घुटी हुई सांसे ,
बन्द कमरा ,
अंदर सड़ती पहचान ,
चीखती है अक्सर ,
पूरी खामोशी के साथ ,
उड़ना चाहती है ,
कुतरे हुए पँखो से ,
और कहना चाहती है ,
अपनी गूंगी जबान से ,
कि ज़िन्दगी ,
तू भले मेरी न हुई ,
मै जी कर दिखाउंगी ,
पर आज़ादी के ये लफ्ज़ ,
गुलामी की बेड़ियों में ,
कुछ इस कदर जकड़े हुए है ,
के जैसे ,
घुटती हुई सांसो के साथ ,
बन्द कमरे में ,
पड़ी हो एक ख्वाब देखती ,
ज़िंदा लाश .....

©ज्योति

परित्यक्ता प्रेमिका

परित्यक्ता प्रेमिका ,
होती है प्रश्नचिन्ह ,
अपने लिए ,
ढोती है अपना अस्तित्व ,
अधूरा अस्तित्व ,
जिसकी पूर्णता का ख्वाब ,
वो टूटते हुए देख चुकी है ....

परित्यक्ता प्रेमिका ,
होती है टूटन ,
किसी टूटे दर्पण की भांति ,
जिसकी चटखन में ,
बिखर जाती है ,
उसकी सारी मुस्कान ...

परित्यक्ता प्रेमिका
करती है बर्दाश्त
टूटन , चटखन , प्रश्नों को ,
पर नही रह पाती  शांत ,
पुनः दुहराते इतिहास पर ...

परित्यक्ता प्रेमिका ,
नही रहना चाहती कैद ,
परित्यक्ता के घेरे में ,
वो उड़ना चाहती है ,
बनाना चाहती है अपनी पहचान ,
बिना किसी झूठे सहारे के ...
.

©ज्योति

वो प्रेम में है

वो प्रेम में है ,
घंटो बैठ बतियाती उससे ,
क्या ये वज़ह काफी नही ,
उसके प्रेम में होने के लिए ....

वो प्रेम में है ,
अक्सर साथ दिख जाती उसके ,
क्या ये भी तर्क सटीक नही ,
उसके प्रेम में होने के लिए ...

वो प्रेम में है ,
कि बिना बात मुस्काती है ,
क्या ये पुख्ता सबूत नही ,
उसके प्रेम में होने के लिए ...

वो प्रेम में है ,
ये बात फैलाते है ,
क्या ये मुद्दा काफी नही ,
उसको भटकाने के लिए ...

वो प्रेम में है ,
आग लगी है ये चारों ओर ,
पर कोई फर्क नही उसे ,
क्या ये रवैया काफी नही ,
उसके आगे बढ़ने के लिए ....

©ज्योति

#मोहब्बतएज़िन्दगी

खुला बाज़ार

बिकती है यहां वर्दियां ,
बिकती है आबरू अबला की ,
लगती है बोली यहां इंसानियत की,
होता है यहां ,
हैवानियत का प्रचार ,
मनुष्यो का ये समाज,
कुछ और नहीं है एक खुला बाज़ार ।
भीगी पलकों का यहां,
कोई मोल नहीं ,
मोल है दौलत का ,
दब जाती है यहां,
चीख एक माँ की ,
  होती है यहां ,
वहशी नरपीसाच् की जयकार,
  मनुष्यो का ये समाज ,
  कुछ और नहीं है एक खुला बाज़ार ।
लूट रहा था जो कल तक ,
रात के अँधेरे में ,
आज बैठा है गद्दी पर ,
सर झुकाता है ईमान यहां ,
मरता है ईमानदार ,
मनुष्यो का ये समाज ,
कुछ और नहीं ऐ एक खुला बाज़ार ।
  भ्रष्टाचार के इस युग में ,
  होता है लाशों का व्यापार ,
  अंधे कानून के इस देश में ,
  इंसाफ की उम्मीद है बेकार ,
  मनुष्यो का ये समाज ,
  कुछ और नहीं है एक खुला बाजार ।