बिकती है यहां वर्दियां ,
बिकती है आबरू अबला की ,
लगती है बोली यहां इंसानियत की,
होता है यहां ,
हैवानियत का प्रचार ,
मनुष्यो का ये समाज,
कुछ और नहीं है एक खुला बाज़ार ।
भीगी पलकों का यहां,
कोई मोल नहीं ,
मोल है दौलत का ,
दब जाती है यहां,
चीख एक माँ की ,
होती है यहां ,
वहशी नरपीसाच् की जयकार,
मनुष्यो का ये समाज ,
कुछ और नहीं है एक खुला बाज़ार ।
लूट रहा था जो कल तक ,
रात के अँधेरे में ,
आज बैठा है गद्दी पर ,
सर झुकाता है ईमान यहां ,
मरता है ईमानदार ,
मनुष्यो का ये समाज ,
कुछ और नहीं ऐ एक खुला बाज़ार ।
भ्रष्टाचार के इस युग में ,
होता है लाशों का व्यापार ,
अंधे कानून के इस देश में ,
इंसाफ की उम्मीद है बेकार ,
मनुष्यो का ये समाज ,
कुछ और नहीं है एक खुला बाजार ।
Thursday, 5 April 2018
खुला बाज़ार
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©ज्योति
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