Thursday, 6 April 2023

आज फिर सीता बन जाना चाहती हूँ ,
फ़ट जाये धरती तो समाना चाहती हूँ ,
बैठे है मेरे चार चार भाई अँगने में ,
वरना कपड़े सुखाने तो मै भी आना चाहती हूँ ....

Friday, 6 January 2023

हर औरत स्त्री नहीं होती

ओढ़ कर शरीर मादा का
अपने मस्तिष्क में
नरबुद्धि पालती हुई औरत
स्त्री नहीं होती......

पीढ़ी-दर-पीढी संस्कार
परंपरा के नाम पर
स्त्री को छलती औरत
स्त्री नहीं होती .....

अपने जीवन का सारा दर्द
दूसरी पीढ़ी को
हस्तांतरित करती औरत
स्त्री नहीं होती .....

पर्दे को हया का नाम दे
किसी की पहचान 
कैद करती औरत 
स्त्री नहीं होती .....

किसी की हँसी को
बेहयाई का नाम दे
जीवन उदास करती औरत
स्त्री नहीं होती .....

मुँह से निकलते शब्दों को
वापस हलक में अटका
किसी को गूंगा करती औरत
स्त्री नहीं होती ...

स्त्री होना आसान नहीं 
निकालनी पड़ती है 
मस्तिष्क से नरबुद्धि 
स्त्री का साथ देने को....

दूसरी स्त्री की मुस्कान में 
खोजनी पड़ती है अपनी खुशी
और बनना पड़ता है कभी-कभी
दूसरे के लिए शब्द अर्थ और वाक्य भी.....

छद्म अलंकारों को नकार कर
ध्वनि को ही रस मान
देना पड़ता है 
किसी के जीवन को सौंदर्य ....

मुश्किल होती होगी शायद
स्त्री होने की ये प्रक्रिया
शायद यही है वजह 
हर औरत स्त्री नहीं होती.....

©ज्योति 

Thursday, 5 January 2023

अब और नहीं

तुम स्त्री हो
तुम जब-जब सोचोगी 
जीवन में स्नेह
तब-तब मिलेगा तुम्हें सब कुछ
सिवाय प्रेम के ....

अपना सब कुछ कर न्योछावर
जब तुम कहोगी प्रेम
तुम्हें मिलेगा जवाब-
नया कुछ नहीं है तुममें
तुम स्त्री हो फ़र्ज़ है तुम्हारा

पीड़ा की लहर से
जब ठहरने लगेगा शरीर
तुम कहोगी दर्द-
तुम्हें मिलेगा ताना 
समय से पहले बुढ़िया होने का....

बिना किसी गलती के 
मिलने पर सजा 
जब तुम कहोगी अन्याय-
तुम्हें मिलेगा उलाहना
सहनशक्ति न होने का ....

अपने भीतर के बीज के
अंकुरण से पहले ही मर जाने पर
जब तुम कहोगी सेहत-
तुम्हें मिलेगी तुलना
विश्व भर की औरतों से ....

इन तानों, उलाहनों, तुलना से
जब थकोगी तुम 
और कहोगी अब बस और नहीं-
तुम्हें मिलेगी तसल्ली
अपने लिए खुद खड़े होने की ...

©ज्योति

Tuesday, 3 January 2023

इकलौती बेटियां

इकलौती बेटियां

इकलौती बेटियां नहीं होती
कभी किसी परिवार का हिस्सा
वे तो होती है बस
इकलौती नाम का 'ठप्पा'
जिसे नहीं होता हक़
एक साथ दो परिवार को अपना कहने का....

इकलौती बेटियां होती है
इक अंतहीन सफर-सी
जिसकी ज़िंदगी यहीं सोचते
हो जाती है ख़त्म
के उसे नहीं है हक़
ज़रा भी अपने बारे में सोचने का ....

इकलौती बेटियां होती है
एक मुक्केबाज़ के पंचिंग बैग सी
जिसे जब-तब सहना होता है
कुछ तानों का दंश
क्योंकि नहीं होता उसे ये हक़
के वो ले सके पक्ष अपने माँ-बाप का ....

इकलौती बेटियां
होती है बड़ी नालायक
जिन्हें नहीं आता ज़रा भी
छोड़ कर आगे बढ़ जाना
के वो नहीं हो पाती स्वार्थी
और बनना चाहती है कंधा पिता का...

इकलौती बेटियां
नहीं लेकर आती किस्मत
इकलौते बेटे सी
के कहते है इन बेटों से
ब्याही लड़कियों के खुल जाते है भाग्य
चली जाती है पांचों उंगलियां घी में ....

इकलौती बेटियों से
नहीं ब्याहे जाने चाहिए बेटे
जिन्हें पाला-पोसा जाता है
कलियों से भी ज़्यादा कोमलता से
के इन बेटियों से ब्याहने पर
हो जाती है उनकी ज़िंदगी बड़ी संघर्षरत....

इकलौती बेटियां
जो भी होती है
बस नहीं होती हृदयहीन
क्योंकि वो नहीं छोड़ पाती
अपनी परवरिश, पैदाईश को
वो ढोती है इन्हें अपने कंधे पर
श्रवण कुमार की तरह .......

©ज्योति 

Friday, 12 October 2018

किरदार मां का ..

वो माँ बनती है ,
जिससे सह सके,
प्रसव की पीड़ा ,
तुम्हें जन्म देने के लिए ,
और कर सके ,
निर्माण तुम्हारे ज़रिये ,
एक नई पीढ़ी का ....

वो माँ बनती है ,
ताकि सुन सके ,
कुछ तानें ,
बेटी जनने के लिए ,
और लड़ सके ,
अपनी बेटी के हक़ के लिए ....

वो माँ बनती है ,
जिससे देख सके ,
बदलते हुए ,
अपने बेटे को ,
और बदल सके ,
खुद को अपनी औलाद के लिए ....

वो माँ बनती है ,
जिससे बदल सके ,
कुछ स्थितियां ,
उसके हिस्से के संघर्ष की ,
और दे सके ,
एक दिशा सार्थक बदलाव की ....

वो माँ बनती है ,
सिर्फ़ देने के लिए
और हम जन्म लेते है ,
जिससे ले सके उसका सर्वस्व ,
नकार सके उसकी पीड़ा ,
अनदेखा कर सके उसकी लड़ाई ..

हम जन्म लेते है ,
और बदल देते है
अपनी प्राथमिकता ,
और तोड़ देते है उसका स्वप्न,
मोड़ देते है खुद को ,
खोखली आधुनिकता की दिशा में ..

वो वही खड़ी देखती है ,
टूटते स्वप्नों को ,
अपनी पीड़ा छिपा लेती है ,
और दोष तुम्हे न देकर ,
कोसती है खुद को ....

पर अपने भीतर की माँ को ,
कभी मरने नही देती ,
क्योंकि वो माँ है ,
और ये किरदार ऐसा है ,
जो बस जीवन देता है ,
और सींचता रहता है जीवन को ,
कभी रक्त से ,
तो कभी आंसुओ से ....

©ज्योति

रात्रि अंधियारी

फूलों की पंखुड़ियों-सी कोमल ,
रौंद देते हो तुम अहं में ,
सिसकियां मिलाते हो मेरी ,
अपनी पैशाचिकता के गर्जन में ..

मेरे एक-एक रक्तमयी अश्रु पर ,
मर्दानगी का जयघोष सुनाते हो ,
लावारिस-सा गोश्त समझ ,
हवस की दावत उड़ाते हो ..

मैं आधार हूँ जीवन का
नारी जिसे सब कहते है
आंखों में भर वहशीपना
मै देवी हूँ- सब कहते है

मैं लाती तुम्हें दुनिया में
मानवता का पाठ पढ़ाती हूँ
इंसानियत को करते शर्मसार जब तुम
अपनी परवरिश पर ठगी रह जाती हूँ

मैं सृष्टि सर्जन का माध्यम बनी
पर जीवन के हक़ से वंचित हूँ
जिस आँचल में दूध भरा था
लिपटी उसी में रक्तरंजित हूँ

कभी खिलखिलाती चंचला थी
बनी आज इक दुखियारी हूँ
जिसके हक़ में आनी थी सुबह
वो स्वयं बनी रात्रि अंधियारी हूँ...

©ज्योति

Friday, 13 April 2018

ज़रिया

तुम बस ज़रिया हो ,
राजनीति का ,
जिसे अभी विपक्ष खेल रहा है ,
और अगले सत्र में ,
आज का पक्ष खेलेगा ,
और मांग करेगा ,
तुम्हारी सुरक्षा की ....

तुम बस ज़रिया हो ,
धर्म के ह्रास का ,
जिसे आज मन्दिर ने झेला है ,
और कल ,
टूटेगी मस्जिद कोई ,
जब वहां कोई लूटेगा ,
तुम्हारी अस्मित ..

तुम समझती क्यूँ नही ,
तुम बस एक ज़रिया हो ,
सबके घरों में लगे ,
छप्पन इंच की टी.वी पर आने का ,
जब घूमेंगे हम इंडिया गेट ,
हाथों में मोमबत्ती लिए ...

मानो मेरी बात ,
तुम बस ज़रिया हो ,
मात्र एक ज़रिया ,,
अपनी हवस बुझाने का ,
कभी घर मे ,
कभी बस में ,
कभी मन्दिर में ,
तो कभी सड़क पर ...

अगर नही यक़ीन मेरी बातों पर ,
तो ये ज़रिया बनना बंद करो ,
बन्द करो इंसाफ़ की गुहार लगाना ,
छीन लो तुम इसे ये हक़ है तुम्हारा ,
गर न छीन सकी अब ,
तो न कहना कभी ,
ज़माना बड़ा खराब है ...

©ज्योति