फूलों की पंखुड़ियों-सी कोमल ,
रौंद देते हो तुम अहं में ,
सिसकियां मिलाते हो मेरी ,
अपनी पैशाचिकता के गर्जन में ..
मेरे एक-एक रक्तमयी अश्रु पर ,
मर्दानगी का जयघोष सुनाते हो ,
लावारिस-सा गोश्त समझ ,
हवस की दावत उड़ाते हो ..
मैं आधार हूँ जीवन का
नारी जिसे सब कहते है
आंखों में भर वहशीपना
मै देवी हूँ- सब कहते है
मैं लाती तुम्हें दुनिया में
मानवता का पाठ पढ़ाती हूँ
इंसानियत को करते शर्मसार जब तुम
अपनी परवरिश पर ठगी रह जाती हूँ
मैं सृष्टि सर्जन का माध्यम बनी
पर जीवन के हक़ से वंचित हूँ
जिस आँचल में दूध भरा था
लिपटी उसी में रक्तरंजित हूँ
कभी खिलखिलाती चंचला थी
बनी आज इक दुखियारी हूँ
जिसके हक़ में आनी थी सुबह
वो स्वयं बनी रात्रि अंधियारी हूँ...
©ज्योति
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