वो माँ बनती है ,
जिससे सह सके,
प्रसव की पीड़ा ,
तुम्हें जन्म देने के लिए ,
और कर सके ,
निर्माण तुम्हारे ज़रिये ,
एक नई पीढ़ी का ....
वो माँ बनती है ,
ताकि सुन सके ,
कुछ तानें ,
बेटी जनने के लिए ,
और लड़ सके ,
अपनी बेटी के हक़ के लिए ....
वो माँ बनती है ,
जिससे देख सके ,
बदलते हुए ,
अपने बेटे को ,
और बदल सके ,
खुद को अपनी औलाद के लिए ....
वो माँ बनती है ,
जिससे बदल सके ,
कुछ स्थितियां ,
उसके हिस्से के संघर्ष की ,
और दे सके ,
एक दिशा सार्थक बदलाव की ....
वो माँ बनती है ,
सिर्फ़ देने के लिए
और हम जन्म लेते है ,
जिससे ले सके उसका सर्वस्व ,
नकार सके उसकी पीड़ा ,
अनदेखा कर सके उसकी लड़ाई ..
हम जन्म लेते है ,
और बदल देते है
अपनी प्राथमिकता ,
और तोड़ देते है उसका स्वप्न,
मोड़ देते है खुद को ,
खोखली आधुनिकता की दिशा में ..
वो वही खड़ी देखती है ,
टूटते स्वप्नों को ,
अपनी पीड़ा छिपा लेती है ,
और दोष तुम्हे न देकर ,
कोसती है खुद को ....
पर अपने भीतर की माँ को ,
कभी मरने नही देती ,
क्योंकि वो माँ है ,
और ये किरदार ऐसा है ,
जो बस जीवन देता है ,
और सींचता रहता है जीवन को ,
कभी रक्त से ,
तो कभी आंसुओ से ....
©ज्योति
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