सुनो ,
मै थक गयी हूँ ,
रोपते-रोपते ,
रिश्तों की बंजर जमीं ,
और जान गयी हूँ ,
अब इस ज़मीं पर ,
नही उगने वाली ,
फसल प्रेम की ,
न ही उगेंगे फूल ,
विश्वास के ,
फिर भी ,
सींचती हूँ इसे ,
अपने खून से ,
आंसुओ से ,
ये सोच ,
बंजर है तो क्या हुआ ,
ये ज़मीं ,
ये रिश्ते ,
हाथ से निकल न जाये ...
Thursday, 26 May 2016
मेरी कहानी (भाग-5)
Tuesday, 24 May 2016
मेरी कहानी (भाग-4)
मै ,
बढ़ती रही ,
कदम दर कदम ,
तुम घेरते रहे मुझे ,
साजिश दर साजिश ,
मै ,
बरसती रही ,
बूँद दर बूँद ,
तुम बहाते रहे मुझे ,
नदी दर नदी ,
मेरी ,
हर ख़ुशी पर ,
तुम डालते रहे,
अपनी नकामियत का बोझ,
मै ढोती रही इसे ,
मन्ज़िल दर मन्ज़िल ,
तुम माने नही फिर भी ,
और लगाते रहे ,
प्रश्नचिन्ह ,
मेरी कामयाबी पर ,
और मै ,
बढ़ती रही ,
बढ़ती रही ,
ये सोच ,
तुम आग बन जलते जाओ ,
मै हवा बन ,
तुम्हे बुझती जाउंगी ....
Thursday, 19 May 2016
कहो आओगे न-3
स्याही से बनी ,
इन रातो में ,
बन कर कुछ ख्वाब,
मेरी नींद में ,
कहो!
आओगे न ...
बन एक ,
सुरीली सी आवाज़ ,
देने अल्फ़ाज़ ,
ज़िंदगी के गीत को,
कहो!
आओगे न ...
बहते अश्क़ो को ,
कैद कर मुट्ठी में ,
बन कर मेरी ,
हँसी की वज़ह ,
कहो !
आओगे न ...
यादो के इस नशे में,
जब बेहकूँगी मै ,
सम्भालने मेरे ,
लड़खड़ाते कदमो,
कहो !
आओगे न ...
फ़िज़ा की शाम बन,
जब ढलूंगी मै ,
बन कर ,
एक नई सुबह,
कहो !
आओगे न ...
Wednesday, 18 May 2016
कविता है के दुनिया दर्शन
जब थक गयी आँखे ,
पढ़ते पढ़ते किताबे
देखने लगी बाहर ,
उस शून्य बिछे आकाश में ,
सोचने लगी ,
भला कैसे कोई ,
बीता सकता है ,
घण्टो इन किताबो में ,
और किताब की ,
इस कविता में .....
हाँ ,
कविता में ,
बस एक कविता ,
और इतना समय ,
कुछ तो था ,
जो बांधे था मुझे ,
इस कविता से ...
वरना यहाँ वहां ,
नाचती हुई निगाहे ,
भला कभी टिकी थी ,
किसी एक जगह ,
पर ,
पर ,
पर आज ,
आज तो बस एक कविता ,
और इतने एहसास ,
कहीं टूटे हुए दिल का एहसास ,
तो कही गहन पीड़ा का ,
कही आत्मबल का बोध ,
तो कही ग्लानि का ,
कही अंधियारी कोठी ,
अँधेरे रास्ते ,
तो कही एक नई सुबह,
एक नई आस ,
भला कवि कैसे डाल गया ,
इतने भाव इस एक कविता में ....
कभी घर ,
तो कभी सड़क ,
कभी भागता दुनिया से ,
तो कभी हो जाता परेशां ,
अँधेरे कमरे में ,
बनते हुए एक चेहरे से ,
और फिर भागता ,
उस चेहरे से दूर ,
एक कविता ही तो थी ,
पर लगा ,
मानो दुनिया बसी हो इसमें ....
शायद ,
कविता में ,
इन्ही भाव ,
इन्ही दृश्यों ने ,
बाँधा मुझे ,
और मेरी ये निगाहे ,
बस देख रही थी ,
दुनिया,
दुनिया की सच्चाई ,
सवार हो कर ,
शब्दों की गाडी पर ...
Monday, 16 May 2016
पर्दा
सुनो ,
उतार फेंका है मैंने ,
तुम्हारा बनाया ये पर्दा ,
के तुम्हारी वहशी नज़रो का ,
मुझे कोई खौफ़ नही ,
अच्छा ज़रा बताना ,
ये पर्दा जो बनाया तुमने ,
वो छिपाता था ,
मुझे तुमसे ,
या तुम्हे मुझसे ,
शायद !
तुम्हे छिपाया है इसने ,
और छिपाया है ,
तुम्हारा चरित्र ,
तुम्हारी सोच ,
तुम्हारे विचार ,
पर अब ,
अब मै समझ गयी हूँ ,
तुम्हारी इस चालाकी को ,
और अब मै देखूंगी ,
सरेआम ,
तुम्हारा ये ओछा चरित्र,
वो क्या है न ,
अब मै सोचने लगी हु ,
गर नियत खराब तुम्हारी है ,
तो पर्दा मै क्यूँ करू ...
Saturday, 14 May 2016
कहो आओगे न -2
जब ओढ़ेगा आसमा ,
रात की चदरिया ,
तो लेकर चाँद का दिया ,
करने मुझे रौशन ,
कहो आओगे न ..
मिल जायेगी जब ,
किरणे सूरज की ,
होगा मिलन रात का दिनसे ,
तब जगाने मुझे नींद से ,
कहो आओगे न ...
ु
Thursday, 12 May 2016
सुनो
सुनो ,
मै देख रही हूँ ,
आसमा के चाँद को ,
क्या देख रहे हो ,
तुम भी ,
मुझे तो दीखते हो तुम ,
क्या दिखती हूँ तुम्हे ,
मै भी ,
पता है आज हवा भी है ,
साथ साथ ,
फिसल रही है बालो से ,
मानो,
फेरी ही तुमने उंगलिया,
सच! सब कितना ,
खूबसूरत है न,
चाँद , हवा
और तुम्हारा एहसास ,
पर बताओ ज़रा,
कब बदलेगा ये एहसास ,
हक़ीक़त में ,
बोलो ,
सुन रहे हो न
सुना न तुमने ....
Wednesday, 11 May 2016
रंग स्याही के
सुनो ,
मुझे ढूंढना मत ,
मै यही रहूंगी ,
इन शब्दों में ,
कर लेना महसूस ,
कोई कविता पढ़कर ,
पर अब ,
अब मै दिखूंगी नही ,
पर रहूंगी यही ,
और देखो ,
अब न कहना ,
कुछ नया लिखू ,
वो क्या है न ,
स्याही खत्म हो गयी है ,
और दुकाने बन्द है ,
जा रही हूँ ढूँढने ,
क्या पता ,
कोई रंग मिल ही जाये ,
फिर लिखूंगी ,
कुछ नया ,
कुछ बेहतर ,
तुम्हारे लिए ,
सिर्फ तुम्हारे लिये ....
Thursday, 5 May 2016
मेरी कहानी (भाग-1)
मेरी कहानी (भाग-1)
क्या सोचते हो ,
मै मजबूत हूँ ,
चट्टानो-पहाड़ो सी ,
न डरती हूँ ,
न झुकती हूँ ,
बस अड़ी रहती हूँ ,
बन कर निर्भया ...
सुनो,
मै भी लड़की हूँ ,
डरती भी हूँ ,
झुकती भी हूँ ,
ये सोच कही ,
मै सच में न बन जाऊ ,
निर्भया ...
Wednesday, 4 May 2016
कहानी (भाग-5)
ए सुनो ,
जाते जाते ,
बन्द कर जाना किवाड़ ,
के मै नही चाहती ,
अब तुम ,
और तुम्हारी ये यादें ,
घुस आये फिर ,
इस ज़िन्दगी में ,
और मै ,
मै बह जाऊ,
शब्दों के सागर में ,
हाँ ,
शब्दों के सागर में ,
जिसे अब तक ,
बांधे बैठी थी ।
यूँ देखो मत ,
और हाँ ,
घूरो भी नही ,
के मैंने डरना छोड़ दिया ,
और अब ,
अब तुम्हारी ये आँखे ,
मुझे डराती नही ,
बस इन्हें देख ,
मुझे याद आता है ,
तुम्हारा खेल ,
खेल प्यार का ,
जो तुम खेलते आये ,
चलो जाओ अब
चले जाओ ,
और कभी न झांकना ,
इस ज़िन्दगी में ,
जाओ ,
चले जाओ ,
दूर बहुत दूर ...
Monday, 2 May 2016
कहानी (भाग-4)
क्या हुआ ,
फिर आगये आज ,
सुनने अपनी गाथा ,
चलो सुनाती हूँ ,
पहले बताओ ,
याद है ,
मैंने सम्भाल खुद को ,
बचाई थी इज्ज़त ,
तुम्हारे घर की ,
याद है न ,
तो कैसे भूले तुम ,
और चले आये ,
करने नीलाम ,
सरेआम मेरी पहचान,
एक बात कहूँ -
"दिल नही ,
तुम्हारे पास ,
बस तख्ती है ,
लकड़ी की"
मुझे हैरत है ,
के तुम ज़िंदा हो,
इस तख्ती के सहारे ,
और तुम्हारा ,
ये बेगैरतपना ,
परवान चढ़ रहा है ,
दिनोंदिन....
खैर छोड़ो ,
मुझे भूलने दो अब ,
के मैंने अब ,
नई पहचान बनाई है ,
इस कहानी के ,
अंश में ..
Sunday, 1 May 2016
रंग दू आज ..
रंग दूँ आज,
खुद को ,
एक नए रंग में ,
बोलो,
कौन-सा रंग ,
पसन्द है तुम्हे ?
चुरा लू बदलो की स्याही ,
या कहो तो-
रंग जाऊ ,
उगते सूरज की लाली में ।
फूलों से मांग लू क्या ?
कुछ रंग उधार ,
या ले आऊँ ,
आसमां की वो ,
नीली चुनरिया ।
वैसे पीला कैसा रहेगा ,
याद है ,
बैठ घण्टो बतियाते ,
हँसते थे ,
सर्दी की उस पीली धूप में ..
तुम कहो तो,
गुलाबी में रंग लू ,
हाँ गुलाबी ,
पसन्द था न तुम्हे ,
सर्द हवाओ में ,
मेरे चेहरे का गुलाबी रंग...
कुछ कहते क्यूँ नही ,
क्या ये पीली धूप ,
गुलाबी रंग ,
कुछ याद नही तुम्हे ,
कही !
पसन्द तो नही आगया ,
कोई और रंग ...