Wednesday, 18 May 2016

कविता है के दुनिया दर्शन

जब थक गयी आँखे ,
पढ़ते पढ़ते किताबे
देखने लगी बाहर ,
उस शून्य बिछे आकाश में ,
सोचने लगी ,
भला कैसे कोई ,
बीता सकता है ,
घण्टो इन किताबो में ,
और किताब की ,
इस कविता में .....

हाँ ,
कविता में ,
बस एक कविता ,
और इतना समय ,
कुछ तो था ,
जो बांधे था मुझे ,
इस कविता से ...

वरना यहाँ वहां ,
नाचती हुई निगाहे ,
भला कभी टिकी थी ,
किसी एक जगह ,
पर ,
पर ,
पर आज ,
आज तो बस एक कविता ,
और इतने एहसास ,
कहीं टूटे हुए दिल का एहसास ,
तो कही गहन पीड़ा का ,
कही आत्मबल का बोध ,
तो कही ग्लानि का ,
कही अंधियारी कोठी ,
अँधेरे रास्ते ,
तो कही एक नई सुबह,
एक नई आस ,
भला कवि कैसे डाल गया ,
इतने भाव इस एक कविता में ....

कभी घर ,
तो कभी सड़क ,
कभी भागता दुनिया से ,
तो कभी हो जाता परेशां ,
अँधेरे कमरे में ,
बनते हुए एक चेहरे से ,
और फिर भागता ,
उस चेहरे से दूर ,
एक कविता ही तो थी ,
पर लगा ,
मानो दुनिया बसी हो इसमें ....
शायद ,
कविता में ,
इन्ही भाव ,
इन्ही दृश्यों ने ,
बाँधा मुझे ,
और मेरी ये निगाहे ,
बस देख रही थी ,
दुनिया,
दुनिया की सच्चाई ,
सवार हो कर ,
शब्दों की गाडी पर ...

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