Wednesday, 11 May 2016

रंग स्याही के

सुनो ,
मुझे ढूंढना मत ,
मै यही रहूंगी ,
इन शब्दों में ,
कर लेना महसूस ,
कोई कविता पढ़कर ,
पर अब ,
अब मै दिखूंगी नही ,
पर रहूंगी यही ,
और देखो ,
अब न कहना ,
कुछ नया लिखू ,
वो क्या है न ,
स्याही खत्म हो गयी है ,
और दुकाने बन्द है ,
जा रही हूँ ढूँढने ,
क्या पता ,
कोई रंग मिल ही जाये ,
फिर लिखूंगी ,
कुछ नया ,
कुछ बेहतर ,
तुम्हारे लिए ,
सिर्फ तुम्हारे लिये ....

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