क्या हुआ ,
फिर आगये आज ,
सुनने अपनी गाथा ,
चलो सुनाती हूँ ,
पहले बताओ ,
याद है ,
मैंने सम्भाल खुद को ,
बचाई थी इज्ज़त ,
तुम्हारे घर की ,
याद है न ,
तो कैसे भूले तुम ,
और चले आये ,
करने नीलाम ,
सरेआम मेरी पहचान,
एक बात कहूँ -
"दिल नही ,
तुम्हारे पास ,
बस तख्ती है ,
लकड़ी की"
मुझे हैरत है ,
के तुम ज़िंदा हो,
इस तख्ती के सहारे ,
और तुम्हारा ,
ये बेगैरतपना ,
परवान चढ़ रहा है ,
दिनोंदिन....
खैर छोड़ो ,
मुझे भूलने दो अब ,
के मैंने अब ,
नई पहचान बनाई है ,
इस कहानी के ,
अंश में ..
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