तुम बस ज़रिया हो ,
राजनीति का ,
जिसे अभी विपक्ष खेल रहा है ,
और अगले सत्र में ,
आज का पक्ष खेलेगा ,
और मांग करेगा ,
तुम्हारी सुरक्षा की ....
तुम बस ज़रिया हो ,
धर्म के ह्रास का ,
जिसे आज मन्दिर ने झेला है ,
और कल ,
टूटेगी मस्जिद कोई ,
जब वहां कोई लूटेगा ,
तुम्हारी अस्मित ..
तुम समझती क्यूँ नही ,
तुम बस एक ज़रिया हो ,
सबके घरों में लगे ,
छप्पन इंच की टी.वी पर आने का ,
जब घूमेंगे हम इंडिया गेट ,
हाथों में मोमबत्ती लिए ...
मानो मेरी बात ,
तुम बस ज़रिया हो ,
मात्र एक ज़रिया ,,
अपनी हवस बुझाने का ,
कभी घर मे ,
कभी बस में ,
कभी मन्दिर में ,
तो कभी सड़क पर ...
अगर नही यक़ीन मेरी बातों पर ,
तो ये ज़रिया बनना बंद करो ,
बन्द करो इंसाफ़ की गुहार लगाना ,
छीन लो तुम इसे ये हक़ है तुम्हारा ,
गर न छीन सकी अब ,
तो न कहना कभी ,
ज़माना बड़ा खराब है ...
©ज्योति
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