परित्यक्ता प्रेमिका ,
होती है प्रश्नचिन्ह ,
अपने लिए ,
ढोती है अपना अस्तित्व ,
अधूरा अस्तित्व ,
जिसकी पूर्णता का ख्वाब ,
वो टूटते हुए देख चुकी है ....
परित्यक्ता प्रेमिका ,
होती है टूटन ,
किसी टूटे दर्पण की भांति ,
जिसकी चटखन में ,
बिखर जाती है ,
उसकी सारी मुस्कान ...
परित्यक्ता प्रेमिका
करती है बर्दाश्त
टूटन , चटखन , प्रश्नों को ,
पर नही रह पाती शांत ,
पुनः दुहराते इतिहास पर ...
परित्यक्ता प्रेमिका ,
नही रहना चाहती कैद ,
परित्यक्ता के घेरे में ,
वो उड़ना चाहती है ,
बनाना चाहती है अपनी पहचान ,
बिना किसी झूठे सहारे के ...
.
©ज्योति
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