Friday, 10 June 2016

तुम्हारा महाकाव्य - 'बलात्कार'

क्या सोचते हो तुम ?
मुझे यूँ जबरन पा लेने से ,
तुम बलात्कारी हो जाते हो,
और तुम्हारा ये कुकर्म ,
बलत्कार बन जाता है ...
नहीं
बलत्कार सिर्फ इतना ही नही ,
इससे कहीं बढ़कर है ,
तुम तो इस प्रक्रिया का ,
पहला चरण मात्र हो ....
जब तुम रौंदते हो,
मेरी आत्मा को ,
नोंचते खसोटते हो,
मेरे ज़िस्म को ,
तब मेरा शरीर घायल होता है ,
और पूरा होता है ,
इस प्रक्रिया का पहला चरण ।
फिर जब फेंक देते हो ,
मुझे जूठी हड्डी की तरह,
सड़क किनारे ,
तब कुछ जानवरो की निगाहें ,
चाटती है मुझे,
मेरा अंग-अंग निहार ,
अपनी भूख मिटाती है ,
और तब पूरा होता है ,
इस प्रक्रिया का दूसरा चरण ।
तभी कुछ रौशनी जलती बुझती है ,
और अगले ही दिन ,
मेरे इस नंगे ज़िस्म का प्रचार,
घर घर होता है ,
और शाम तक मेरी नाम की मोमबत्ती,
कर देती है रौशन शहर को ,
और ये था ,
इस प्रक्रिया का तीसरा चरण ।
अब तक मै ,
जूठी नंगी हड्डी मात्र थी,
जिसे एक हादसे ने ,
घर घर में ,
मुद्दा बना दिया बहस का ।
अब शुरू होता है ,
तुम्हारी इस हरकत का ,
अंतिम चरण,
जहां मै खड़ी हूँ
न्याय के लिए ,
पर यहां भी न्याय नही मिलता ,
मिलती तो तुम्हे है -
मुक्ति ,
और इस मुक्ति की कीमत ,
मै चुकाती हूँ -------
तुम्हारे हाथों की छाप ,
मेरे ज़िस्म के किस किस कोने पर है ,
तुम्हारे दांतों के निशां कितने है ,
कितनी मरतबा तुमने ,
इस महाकाव्य को ,
रचा है मेरे शरीर पर ,
सब बताती हूँ ।
और यहां तक पहुंचते पहुंचते ,
मेरा ज़िस्म ,
मेरी आत्मा ,
सब जूठा हो चुका है ,
और मै खड़ी ,
इस न्यायसभा में ,
तुम्हारे रचे इस महाकाव्य को ,
नाम दे रही हूँ -
बलात्कार का ।

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