Friday, 29 April 2016

बारिश

जानते हो ,
आज की बारिश ,
अकेले नही आयी,
ले कर आयी थी ,
तुम्हारी यादों का पिटारा ,
भिगों कर मुझे ,
तरबतर कर गयी ,
तुम्हारी यादों से ,
अपनों की ही भीड़ में ,
मुझे अकेला कर ,
कह गयी ,
मुझे कोई हक़ नहीं ,
तुम्हारे बिना ,
यूँ भीगने का ,
भीग कर ,
बालों को खोलने का ।
शायद ,
मै भी यही सोचती हूँ ,
ये बारिश ,
ये भीगना ,
बालों का खुलना ,
सिर्फ तुम्हारे लिए था ,
और आज ,
बेहतर होगा ,
मै इन बालों को ,
सपनो को समेट लूँ ,
इंतज़ार करुँ ,
तुम्हारे आने का ,
उस बारिश का ,
जिसमे कभी ,
भीगे थे हम-तुम ।

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