कहानी (भाग-2)
सुनो,
निकल तो गए हो तुम,
मेरी इस ज़िन्दगी से,
क्या सुनोगे नही ,
जाते जाते अपनी गाथा ,
याद है ,
जब मिले थे तुम,
पहली बार ,
और कहा-
'मुझे चाल पसन्द है तुम्हारी '
और मै ,
मै बस हँस दी ,
फिर ,
हम मिले ,
अब दरम्यां हमारे ,
कोई न था ,
तुम रोज़ खेलते थे,
खेल प्यार का ,
और मै ,
बस हँस देती
तबसे ,
मै हंसती रही ,
शायद ,
समझ ही न सकी ,
के तुम ,
जो कभी दीवाने थे ,
मेरी चाल के ,
अब बदल रहे हो ,
अपनी चाल ,
मै नही समझ सकी ,
के तुम ,
अब हो रहे हो दीवाने ,
किसी और ,
चाल-ढाल के ,
मै ,
बस हंसती रही ,
देखती रही ,
तुम्हे गिरते हुए ,
अपनी निगाहों से ,
और देखो ,
आज तुम ,
खुद गिर गए हो ,
अपनी ही निगाहो में .....
Wednesday, 27 April 2016
कहानी (भाग -2)
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©ज्योति
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