"तुम लड़की हो ,
इतना मत हँसो ,
यूँ हर किसी पर ,
यक़ीन न करो ,
ज्यादा बात न करो ,
मत भूलो ,
ये समाज ,
इंसानों का नही ,
सामंतो का है ,
ये सामंत हथिया लेंगे,
तुम्हारी इज्जत ,
जैसे तुम लड़की नही ,
बस इक ज़मीं का टुकड़ा हो ,
तुम हँसोगी ,
ये समझेंगे ,
तुम फस गयी ,
तुम यक़ीन करोगी इन पर ,
ये तुम्हें जोत देंगे ,
ऊगा देंगे जख्मों की फसल ,
तुम बतियाओगी इनसे ,
ये समझेंगे ,
अब तुम बस उनकी हो ,
और हाँ ,
जहा इन्होंने ये सोचा ,
समझो ,
तुम अब फंस चुकी हो ,
इसलिए कहती हूँ ,
तुम लड़की हो ,
तम्हे कोई हक़ नही ,
के तुम हँसो ,
बोलो ,
और हां यक़ीन ,
ये शब्द तुम्हारे लिए नही है ....
तुम लड़की हो ,
तुम बनी हो ,
चार हाथ का घूंघट काढ़ कर ,
चूल्हा चौका करने को,
अपनी औकात मत भूलो,,
वरना तुम भी बन जाओगी ,
दामिनी ...
निर्भया ....
या ,
एक अनाम ,
बलात्कार पीड़िता ..."
नोट :- पुरुषों की हंसी तो फंसी मानसिकता पर आधारित ..कृपया व्यक्तिगत न ले ...
4-अगस्त-2016
©ज्योति
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