उसकी झुकी नज़र,
कुछ कहती थी ,
हर गम वो मासूम ,
अकेले ही सहती थी ,
कसूर क्या था उसका ??
न जाने कोई ,
कभी खुद को तो ,
कभी लङकी जात को कोसती थी ।
शायद ये वो कली थी,
जो खिली तो सही,
पर महक न सकीं ,
बेटी होने का बोझ,
वो हर पल ढ़ोती थी ।
किसोरी बनी तो ,
हवसीं निगाहें नोंचती थी ,
इस डर को ले ,
वो अंदर ही अंदर घुटती थी ।
ब्याही गई तो ,
दहेज की आग जलाती थी,
उसकी कोख न जन्में बेटी,
ये सोच उसे डराती थी ।
बेटा नहीं वो बेटी थी ,
कसूर यहीं था उसका ,
जो कभी खुद को तो ,
कभी लङकी जात को कोसती थी।
कुछ कहती थी ,
हर गम वो मासूम ,
अकेले ही सहती थी ,
कसूर क्या था उसका ??
न जाने कोई ,
कभी खुद को तो ,
कभी लङकी जात को कोसती थी ।
शायद ये वो कली थी,
जो खिली तो सही,
पर महक न सकीं ,
बेटी होने का बोझ,
वो हर पल ढ़ोती थी ।
किसोरी बनी तो ,
हवसीं निगाहें नोंचती थी ,
इस डर को ले ,
वो अंदर ही अंदर घुटती थी ।
ब्याही गई तो ,
दहेज की आग जलाती थी,
उसकी कोख न जन्में बेटी,
ये सोच उसे डराती थी ।
बेटा नहीं वो बेटी थी ,
कसूर यहीं था उसका ,
जो कभी खुद को तो ,
कभी लङकी जात को कोसती थी।

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