दीमक हैं ये नक्सलवाद
हम दबाते चले जाते हैं,
वो सहते रहते हैं ,
हम छीनते रहते हैं ,
वो आंसू बहाते हैं ।
हम कर देते हैं ,
सारी हदें पार ,
वो देखते रहते हैं ,
बनकर लाचार ।
फूटता हैं जब इनका आक्रोश ,
पनपती हैं इनमें बगावत ,
तब हम कहते हैं ,
दीमक हैं ये नक्सलवाद ।
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