Saturday, 26 July 2014

वाह! ,

वाह! ,
ये तुमने खेल अच्छा रचा ,
तुम्हारी चाल ,
तुम्हारा प्यादा ,
जीत तुम्हारी ,
और रानी ,
वो भी तुम्हारी ,
वाह!
जरा बताना ,
इस खेल का नाम ,
मैं कहूँगी ,
ये हैं ,
छल ,
शह ,
और मात ,
जिसमें पिसती हैं रानी ,
तुम्हें इसमें रस मिलता हैं ,
और मुझे घृणा हैं ,
इस खेल से ,
क्योंकि मैं लगती हूँ ,
इस खेल में दांव पर ,
और ये खेल नहीं ,
छल हैं ,
मेरी अस्मित से खिलवाङ का ।
तुमने हर मोङ पर ,
हर कदम पर ,
मुझे मोहरा बनाया ,
शायद तुम्हें ज्ञात ही नहीं हैं,
मैं समझ चुकी हूँ ,
तुम्हारी हर चाल ,
और अब बारी ,
तुम्हारी हैं ,
और मैं ,
तुम्हारे इस घिनौने खेल का
अंत हूँ ।

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