Saturday, 26 July 2014

मैं...

मैं तपती रेत का,
वो कण हूँ ,
जिस तक समुद्र की लहरें ,
कभी नहीं पहुँचती ,
ज्यों पास आती हैं लहरें ,
उठा कर हवा दूर कर देती हैं,
न जाने कब मेरी प्यास बुझेगी ,
इस तृष्णा को तृप्ति कब मिलेगी ?? बेहतर हैं दूर हूँ लहरों सें ,
मिल भी गई जो अब ,
मैं घुल न सकूँगी ,
जरूरी हैं दूर हो जाउ इनसे ,
ऐ हवा ! दे मेरा साथ ,
उङा ले जा मुझे ,
अपने वेग सें ।

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