तुम कहते हो ,
बदलाव हुआ हैं ,
हाँ सच कहा तुमने ,
बदलाव हुआ हैं ,
बदल गया हैं शोषण ,
घर की चारदीवारी नहीं,
ये अब होता हैं ,
खुले आसमान के नीचे ।
उस समय नग्न मैं नहीं ,
नग्न होती हैं इन्सानियत ,
कोई हाथ आगे नहीं आता,
जब छीनी जाती हैं ,
मेरी अस्मित,
वाकई बदलाव हुआ हैं ,
बदल गया हैं शोषण।
लटकती हूँ जब मैं,
दुष्कर्म के बाद ,
दिखती हैं तुम्हारी मानसिकता ,
बिकता हैं तुम्हारा ज़मीर ,
मरती उस समय मैं नहीं,
मरती हैं तब इन्सानियत ।
संभल जाओ इससे पहले ,
मैं कहूँ बदलाव हुआ हैं ,
बदल गया हैं समाज ,
जिसमें पुरूष हैं पर ......
स्त्री नहीं ।
बदलाव हुआ हैं ,
हाँ सच कहा तुमने ,
बदलाव हुआ हैं ,
बदल गया हैं शोषण ,
घर की चारदीवारी नहीं,
ये अब होता हैं ,
खुले आसमान के नीचे ।
उस समय नग्न मैं नहीं ,
नग्न होती हैं इन्सानियत ,
कोई हाथ आगे नहीं आता,
जब छीनी जाती हैं ,
मेरी अस्मित,
वाकई बदलाव हुआ हैं ,
बदल गया हैं शोषण।
लटकती हूँ जब मैं,
दुष्कर्म के बाद ,
दिखती हैं तुम्हारी मानसिकता ,
बिकता हैं तुम्हारा ज़मीर ,
मरती उस समय मैं नहीं,
मरती हैं तब इन्सानियत ।
संभल जाओ इससे पहले ,
मैं कहूँ बदलाव हुआ हैं ,
बदल गया हैं समाज ,
जिसमें पुरूष हैं पर ......
स्त्री नहीं ।
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