काली अंधियारी रात कहूँ,
या कहूँ तुम्हें निशा,
जो भी हो तुम ,
हो मेरे भागते जीवन में ,
विश्राम की घङी ।
शांत बहती नदी हो तुम ,
हो शीतलता लिए चांद की,
नही जानती मैं ,
तुम स्वप्न हो मेरा ,
या हो कङी भावों के बांध की ।
इस गहरे मन में ,
बसती हो तुम सदा ,
खींच देती हो लकीरें ,
भावों पर अतीत की ।
काली अंधियारी रात कहूँ ,
या कहूँ तुम्हें निशा ,
सच कहूँ तो जीवन में मेरे ,
रेखा हो तुम स्मृतिपटल की ।
या कहूँ तुम्हें निशा,
जो भी हो तुम ,
हो मेरे भागते जीवन में ,
विश्राम की घङी ।
शांत बहती नदी हो तुम ,
हो शीतलता लिए चांद की,
नही जानती मैं ,
तुम स्वप्न हो मेरा ,
या हो कङी भावों के बांध की ।
इस गहरे मन में ,
बसती हो तुम सदा ,
खींच देती हो लकीरें ,
भावों पर अतीत की ।
काली अंधियारी रात कहूँ ,
या कहूँ तुम्हें निशा ,
सच कहूँ तो जीवन में मेरे ,
रेखा हो तुम स्मृतिपटल की ।

स्वागत है।
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