एहसास तुम्हारे ,
जब घुटने लगे ,
आँखे जब तुम्हारी ,
छलकने को हो ,
कैद कर दो खुद को ,
भीड़ में कही ...
शब्द जब तुम्हारे ,
खामोश होने लगे ,
निगाहें तुम्हारी ,
करने लगे शोर ,
भर दो स्याही रंगीन,
इस बेरंग ज़िन्दगी में ....
दबने लगो जब ,
ख्वाहिशों के बोझ तले ,
सपने भरने लगे तुम्हारे ,
एक स्वतंत्र उड़ान ,
कर दो खुद को गुम ,
दुनिया की अपेक्षाओं में ...
वर्तमान युग की युवा नारी ,
ये रामबाण नुस्खा है तुम्हारे लिए ,
आधुनिक बन कर भी ,
खुद को परम्पराओं से जोड़ने का.....
क्या हुआ चौंक गयी ,
अरे सच है ये ,
मानो मेरी बात ,
हमारा समाज आधुनिक नही ,
बस करता है छलावा आधुनिक होने का ....
यही बेहतर भी है
तुम्हारे लिए ,
करो तुम भी आधुनिक होने का ढोंग ,
और बचाओ खुद को परम्पराओं की सड़ांध से ....
©ज्योति
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